by admin on | Dec 19, 2024 05:27 PM
पत्रकारिता का गिरता स्तर और मुद्दों से भटकती पत्रकारिता ..?
पत्रकारिता एक ऐसी ताकत है जो सत्ता को हिला कर रख सकती है...!
देश को समाज के मुद्दों के लिए लड़ने वाले पत्रकारों की है जरूरत .!
वर्तमान में पत्रकारिता हो कहा रही है। पत्रकार सरकार के प्रवक्ता बने हुये है वो सत्ता पक्ष की नाकामियो का जवाब भी विपक्ष से पुछ रहे है।
"आदित्य गुप्ता"
अम्बिकापुर - किसी अंधे को 10 लाख के सुट, में भी फकीरी दिख जाती है? तो किसी को नेता जी के मंत्री ,मुख्यमंत्री या अन्य बनने पर भी उनका क्रिमिनल रिकार्ड नही दिखता उनके अंदर का भू माफिया नही दिखता ? कई वरिष्ठ तो शपथ समारोह में पत्रकारिता करने जाते है और बाहर आते ही मंत्री की ली हुई शपथ भूल जाते है ? बस यही कारण है कि वर्तमान में पत्रकारिता का गिरता स्थत गिर रहा है और मुदों से पत्रकारिता भटक रही है। वर्तमान पत्रकारिता की बात की जाए तो पत्रकारिता वाकई मे खतरे मे है। सभी पत्रकार हमारे देश की ज्वलंत समस्यों के बजाय नेताओ के पीछे चैनल का डंडा लेकर उनके आगे पीछे घूमते हुए चाय और नाश्ता चाट रहे है..? पत्रकार वर्तमान में सरकार के गुणगान मे लगा है । गरीबी, विकास, बेरोजगारी, पर्यांवरण, शिक्षा आदि मुद्दो पर कोई बहस ही नहीं होती "? जनता की आवाज को उठाना, निष्पक्ष पत्रकारिता करना, सरकार की गलत नीतियों को जनता के समक्ष लाना, सच क्या है जनता को बताना, लोगों के हक के लिए सरकार से टकराना, भ्रष्टचार को उजागर करना, समाज के मुद्दों के लिए लड़ना के साथ वास्तव में पत्रकारिता एक ऐसी ताकत है जो सत्ता को हिला कर रख सकती है । सत्ता की नींद हराम कर सकती है । अगर आज हमारा देश लोकतात्रिक देश कहा जाता है तो इसका पूरा श्रेय पत्रकारिता को ही दिया जाएगा। मगर मौजूदा स्थिति की बात की जाए तो इनमें से एक काम भी मीडिया द्वारा बिल्कुल भी नहीं किया जा रहा है । भ्रमित करने वाली खबरें चलाकर लोगों को भ्रम की स्थिति में रखा जा रहा है आज का मीडिया एक ही पक्ष का हो गया है ।और वह सिर्फ़ सरकार की भाषा बोलने लगा है । जिस वजह से आज समाज का बहुत बड़ वर्ग सच्चाई से दूर जा चुका है आज मीडिया प्रोपेगेंडा कर रहा है ।और वह खुद तय करता है कि कब क्या होना चाहिए ? लोकतंत्र की बेहतरी के लिए ये जरूरी है कि लोकतंत्र में संस्थाएं या तो निष्पक्ष हों या बहुपक्षीय। लोकतंत्र में एकपक्षीय संस्था से घातक कुछ नहीं होता। प्रेस कुछ दिनों से पूरी तरह से एकपक्षीय हो गया था। वर्तमान में पत्रकारिता हो कहा रही है। पत्रकार सरकार के प्रवक्ता बने हुये है वो सत्ता पक्ष की नाकामियो का जवाब भी विपक्ष से पुछ रहे है। कोई पुछ रहा है आप आम खाते है तो क्या चुस कर खाते है या छिलका निकाल कर? कोई पुछ्ता है पर्स रखते है तो उसमे पैसे रखते है कि नही? किसी अंधे को 10 लाख के सुट,मे भी फकीरी दिख जाती है? तो किसी को नेता जी के मंत्री,मुख्यमंत्री या अन्य बनने पर भी उनका क्रिमिनल रिकार्ड नही दिखता उनके अंदर का भू माफिया नही दिखता ? कई वरिष्ठ तो शपथ समारहो में पत्रकारिता करने जाते है और बाहर आते ही मंत्री की ली हुई शपथ भूल जाते है ? बस यही कारण है कि वर्तमान में पत्रकारिता का गिरता स्थत गिर रहा है और मुद्दों से पत्रकारिता भटक रही है ?
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