by admin on | Jan 16, 2025 04:20 PM
नमस्कार, मैं बस्तर का पत्रकार हूं...पोल खोली तो फंसाया या मारा जाऊंगा !
मुकेश चंद्राकर हत्याकांड ने बस्तर से लेकर दिल्ली तक पत्रकारिता जगत को हिलाकर रख दिया...!
क्या बस्तर में पत्रकारिता करना बेहद जोखिम भरा...!
अब देखना ये होगा कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए विष्णु देव साय की सरकार आखिर क्या कदम उठाती है?
नमस्कार,मैं बस्तर का पत्रकार हूं...जी हां वही बस्तर... जहां नक्सलियों की कदम-कदम पर आईईडी, स्पाइक होल्स के खतरों को पार कर आदिवासियों की आवाज बनने के लिए जाता हूं... पोल खोलता हूं तो या तो बड़े षड्यंत्र में फंसाया जाता हूं या फिर मौत के घाट उतार दिया जाता हूं.ग्रामीणों की आवाज बनकर सिस्टम से सवाल करता हूं तो अंदर वालों (नक्सलियों) का आदमी कहलाता हूं,सिस्टम के साथ चलता हूं तो पुलिस का मुखबिर बताकर नक्सली परेशान करते हैं. भ्रष्टाचार,माफियाओं की पोल खोलता हूं तो फर्जी केस में फंसाया जाता हूं या फिर बेरहमीं से मारा जाता हूं...
बस्तर में पत्रकारिता जगत एक बार फिर से हिल गया है.बस सवाल यही है कि बस्तर की पत्रकारिता का भविष्य आखिर क्या होगा?
बस्तर में जवानों ने किया बड़ा ब्लास्ट, हमले में शहीद हुए 76 जवान... बस्तर में नक्सलियों ने यात्रियों से भरी बस को विस्फोट कर उड़ाया ...बस्तर में पुलिस-नक्सली मुठभेड़ में एक दुध मुंही बच्ची की गोली लगने से मौत.. जी हां ये वही बस्तर, जहां पर दिल दहला देने वाली वारदातें होती हैं...बस्तर में पत्रकार जान जोखिम में डालकर सेवाएं दे रहे हैं.उनमें से एक सच्चा साथी और पत्रकार भाई मुकेश चंद्राकर भी था. मुकेश की ज़िंदगी बेहद संघर्ष भरी रही है.सलवा जुडूम के दौर की पीड़ा को उसने बाल्य अवस्था में झेला है. बचपन में ही माता-पिता का साया छिन गया था. संघर्षों और पीड़ा ने उसे मजबूत बनाया.वह सीएम बनना चाहता था.उसने भाई से प्रेरित होकर पत्रकारिता के पेशे को चुना. स्थानीय आदिवासियों की आवाज बना.मुकेश के अंदर काम करने के लिए गजब का जूनून था. इसी जूनून ने उसे काफी ऊंचाइयों तक पहुंचाया. इस बीच उसे अफसरों,नेताओं, ठेकेदारों से धमकियां मिलीं. फिर भी उसने हार नहीं मानी और आवाज उठाता रहा।
इसी बस्तर में नक्सलियों ने पत्रकार साईं रेड्डी और नेमीचंद जैन जैसे सीनियर पत्रकारों की हत्या की है. नक्सलियों और पुलिस के बीच हुई गोलीबारी की चपेट में आकर दूरदर्शन का एक पत्रकार मारा गया है. नक्सली उनका कैमरा लेकर भाग जाते हैं. इन घटनाओं को कुछ साल ही हुए होंगे, इस बार बस्तर का एक युवा और जांबाज पत्रकार भाई मुकेश चंद्राकर की भ्रष्ट ठेकेदार और उसके भाइयों ने बेरहमी से सिर्फ इसलिए हत्या कर दी क्योंकि उसने भ्रष्टाचार से बन रही सड़क की पोल खोलकर रख दी थी।
इस घटना ने बस्तर से लेकर दिल्ली तक पत्रकारिता जगत को हिलाकर रख दिया है.बस्तर में पत्रकारिता करना स्थानीय पत्रकारों और उनके परिजनों की चिंता बढ़ गई है.यहां नक्सलवाद के साथ भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा बन गया है। हाल के ताजा मामले देखें तो चार पत्रकारों को आंध्रप्रदेश-छत्तीसगढ़ बॉर्डर पर गांजा तस्करी के फर्जी केस में फंसाया गया था. इस षड्यंत्र के पीछे कोंटा के थानेदार का हाथ होने का दावा है . सरकार ने एक्शन लेते हुए उसे हटा दिया था. इस मामले में चारों पत्रकारों को जमानत तो मिल गई है लेकिन वे आज भी थाने के चक्कर काट रहे हैं. इसके कुछ महीने के बाद ही जब बीजापुर के पत्रकार भाई मुकेश चंद्राकर ने नक्सलियों के गढ़ में बन रही सड़क निर्माण की पोल खोली तो उसे बेरहमी से मारकर सेप्टिक टैंक में डालकर उस पर स्लैब डाल दिया गया।
बस्तर में नक्सलवाद का दायरा सिमटता ज़रूर जा रहा है.लेकिन अंदरूनी इलाकों में नक्सलियों का भय आज भी है.फ़ोर्स उनके ठिकानों तक पहुंचकर डेरा डालकर बैठी है, इसके साथ ही सड़कों का जाल बिछ रहा है.जवानों की सुरक्षा में निर्माण काम हो रहे हैं. नक्सल इलाके का फायदा उठाकर ठेकेदार इन सड़कों के निर्माण में भारी भ्रष्टाचार कर रहे हैं. बस्तर में अरनपुर से जगरगुंडा,बीजापुर से जगरगुंडा, बारसूर-पल्ली सड़क ताजा उदाहरण है, जो बनने से पहले ही उखड़ रही है.ऐसे ही तमाम भ्रष्टाचार की पोल खोलने वाले साथियों को धमकियां मिलती हैं।
बस्तर में पत्रकारिता करना बेहद जोखिम भरा है. यहां का स्थानीय पत्रकार बेहद नाजुक परिस्थियों से गुजरता है. चुनौती क्षेत्र की विषम भौगोलिक परिस्थितियां तो हैं ही साथ नक्सलवाद भी एक बड़ी समस्या है.बस्तर में पत्रकारों के अंदर काम करने के लिए गजब का जूनून है. यही जूनून भाई मुकेश के अंदर भी था. बेहद कम समय में एक बड़ा नाम कमाया था.मुकेश की हत्या के बाद अब ये बात साबित हो गई है कि बस्तर में पत्रकार दो धारी नहीं बल्कि तीन धारी तलवार के बीच काम कर रहे हैं.पत्रकार सुरक्षा क़ानून पर पिछली सरकार में बातें ज़रूर हुईं लेकिन क़ानून नहीं लाया जा सका. अब देखना ये होगा कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए विष्णु देव साय की सरकार आखिर क्या कदम उठाती है?
लेखक अंबु शर्मा छत्तीसगढ़ के बस्तर की रहने वाली हैं. उन्होंने 14 सालों तक बस्तर में तमाम चुनौतियों के बीच पत्रकारिता की हैं. यहां की परिस्थितियों, समस्याओं की अच्छी समझ है.
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं।
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